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⚖️ सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान और कानून का समान संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2022 के Budhadev Karmaskar v. State of West Bengal मामले में स्पष्ट किया था कि वयस्क और अपनी सहमति से सेक्स वर्क करने वाली महिला के खिलाफ पुलिस को केवल उसके पेशे के आधार पर अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई या हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सेक्स वर्कर्स भी संविधान के तहत गरिमा और समान कानूनी संरक्षण की हकदार हैं।
🔴 कोर्ट के प्रमुख दिशा-निर्देश
• वयस्क और सहमति से सेक्स वर्क करने वाले व्यक्ति को कानून का समान संरक्षण मिले।
• पुलिस को ऐसे लोगों के साथ मौखिक या शारीरिक दुर्व्यवहार, हिंसा या उत्पीड़न नहीं करना चाहिए।
• किसी रेड के दौरान यदि महिला स्वेच्छा से सेक्स वर्क कर रही है, तो उसे केवल इस आधार पर गिरफ्तार, दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।
• सेक्स वर्कर यौन हिंसा की शिकायत करे तो पुलिस को उसकी शिकायत गंभीरता से लेकर कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी और उसे यौन अपराध की पीड़िता को मिलने वाली चिकित्सा सहायता उपलब्ध करानी होगी। • मीडिया को रेड या रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सेक्स वर्कर्स की पहचान उजागर करने वाली तस्वीरें/जानकारी प्रकाशित या प्रसारित करने से बचना चाहिए। • सेक्स वर्कर्स के बच्चों को केवल मां के सेक्स वर्क में होने के आधार पर उससे अलग नहीं किया जाना चाहिए।
⚠️ जरूरी कानूनी तथ्य
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में वेश्यावृत्ति से जुड़ी हर गतिविधि कानूनी है। Immoral Traffic (Prevention) Act और अन्य लागू कानूनों के तहत trafficking, शोषण और कई प्रकार की third-party गतिविधियां अपराध हो सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण खास तौर पर वयस्क, स्वैच्छिक और सहमति से सेक्स वर्क करने वालों के अधिकारों से जुड़ा है।
2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सिद्धांत को दोहराया और कहा कि वयस्क स्वैच्छिक सेक्स वर्कर्स की पहचान शुरुआती स्तर पर की जानी चाहिए तथा उनकी सहमति और इच्छा को संरक्षण, पुनर्वास और reintegration से जुड़े फैसलों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
फैक्ट-चेक निष्कर्ष: ✅ अखबार की मुख्य खबर सही, लेकिन हेडलाइन/प्रस्तुति में कानूनी बारीकी जरूरी है। अखबार की कटिंग स्वयं 27-05-2022 की है, इसलिए इसे नई/आज की सुप्रीम कोर्ट खबर बताकर पोस्ट नहीं करना चाहिए।
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