राजनीति अपनी जगह, भारतीय संस्कृति अपनी जगह

पीलीभीत में एमएलसी चुनाव के दौरान जलपान ने दिया आपसी सम्मान और सद्भाव का संदेश
डॉ. प्रेम सागर शर्मा
पीलीभीत | विशेष लेख
राजनीति में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में अलग-अलग दलों की विचारधाराएँ, नीतियाँ और राजनीतिक लक्ष्य भी अलग होते हैं। चुनाव के दौरान एक-दूसरे के विरोध में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिलते हैं। लेकिन इन सबके बीच भारतीय समाज की एक ऐसी खूबसूरती है, जो राजनीतिक सीमाओं से कहीं ऊपर है—वह है अतिथि सत्कार, भोजन का सम्मान और आपसी सद्भाव की संस्कृति।
कल एमएलसी चुनाव के दौरान पीलीभीत में इसी सांस्कृतिक परंपरा की एक सहज और उल्लेखनीय झलक देखने को मिली। बताया गया कि भाजपा नेतृत्व और नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. आस्था अग्रवाल की ओर से उनके कैंप से भेजा गया जलपान अन्य राजनीतिक दलों के कैंपों में भी पूरे सम्मान के साथ ग्रहण किया गया। राजनीतिक विचारों में भिन्नता के बावजूद जलपान को स्वीकार करना इस बात का प्रतीक है कि प्रतिद्वंद्विता का अर्थ व्यक्तिगत कटुता या सामाजिक दूरी होना आवश्यक नहीं है।
यह दृश्य किसी चमत्कार से कम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। हमारे यहाँ भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि स्नेह, सद्भाव और आत्मीयता का माध्यम भी है। किसी के द्वारा प्रेमपूर्वक परोसी गई खाद्य सामग्री को सम्मान देना हमारी सामाजिक परंपरा का हिस्सा रहा है। इसी भावना को हमारी संस्कृति में ‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे आदर्शों से बल मिलता है।
मिठास के रिश्ते, मतभेदों के बीच भी
इस संदर्भ में वर्ष 2019 का एक चर्चित उदाहरण याद आता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में बताया था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उन्हें समय-समय पर कुर्ते और बंगाली मिठाइयाँ भेजती हैं। ममता बनर्जी ने भी स्पष्ट किया था कि मेहमानों और परिचितों को मिठाई तथा उपहार देना बंगाल की संस्कृति और शिष्टाचार का हिस्सा है। दोनों नेताओं के बीच तीखे राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद यह परंपरा चर्चा में रही।
इस उदाहरण का सार यह नहीं कि मिठाई भेजने से राजनीतिक मतभेद समाप्त हो जाते हैं, बल्कि यह है कि राजनीतिक असहमति के साथ भी सामाजिक शिष्टाचार कायम रखा जा सकता है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण विरोधी के प्रति मानवीय सम्मान बनाए रखना भी है।
भारत में राजनीतिक बैठकों और सार्वजनिक आयोजनों में भोजन साझा करने की परंपरा के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं। वर्ष 2019 में कोलकाता में ममता बनर्जी की ओर से आयोजित विपक्षी नेताओं की रैली के बाद विभिन्न राज्यों के नेताओं के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के व्यंजन परोसे गए। यह विविधता भारतीय खानपान की उस परंपरा को सामने लाती है, जिसमें अलग-अलग भाषाओं, प्रदेशों और विचारधाराओं के लोग एक साथ बैठ सकते हैं।
इसी तरह मध्य प्रदेश में वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट बैठक में मंत्रियों द्वारा अपने घरों से लाया गया भोजन साझा करने की पहल भी चर्चा में रही। इस तरह के आयोजन यह दिखाते हैं कि भोजन के माध्यम से औपचारिक माहौल में भी संवाद और आपसी मेलजोल के अवसर बनाए जा सकते हैं।
भोजन का सम्मान, देने वाले के प्रति सम्मान
भारतीय परिवारों में आज भी यह परंपरा जीवित है कि कोई पड़ोसी, परिचित या अतिथि कुछ खाने के लिए दे, तो यथासंभव उसका आदरपूर्वक स्वागत किया जाता है। त्योहारों पर मिठाइयों का आदान-प्रदान, विवाह समारोहों में सामूहिक भोज और धार्मिक आयोजनों में भंडारे इसी सामाजिक भावना के अलग-अलग रूप हैं।
इस परंपरा का एक गहरा पक्ष यह भी है कि भोजन स्वीकार करना कई बार सामने वाले के सद्भाव को स्वीकार करना होता है। इसका अर्थ राजनीतिक समर्थन देना नहीं है। कोई व्यक्ति किसी दल की नीतियों का विरोध करते हुए भी उसके कार्यकर्ताओं के साथ सामान्य शिष्टाचार निभा सकता है। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज की पहचान है।
हालाँकि, भोजन ग्रहण करने या न करने के पीछे व्यक्तिगत पसंद, स्वास्थ्य, धार्मिक मान्यताएँ और अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए किसी के भोजन स्वीकार करने या अस्वीकार करने को राजनीतिक समर्थन अथवा विरोध का अंतिम प्रमाण नहीं मानना चाहिए। महत्त्व उस भावना का है, जिसके साथ लोग एक-दूसरे के प्रति व्यवहार करते हैं।
राजनीति में भी बनी रहनी चाहिए मर्यादा
पीलीभीत में एमएलसी चुनाव के दौरान सामने आया यह प्रसंग हमें एक महत्त्वपूर्ण संदेश देता है—चुनाव आते-जाते रहेंगे, दल बदलते रहेंगे, सत्ता पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ भी बदलती रहेंगी, लेकिन समाज के आपसी रिश्ते और सांस्कृतिक मूल्य स्थायी रहने चाहिए।
राजनीतिक विरोध का उद्देश्य नीतियों, विचारों और निर्णयों पर बहस करना होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत संबंधों में कटुता पैदा करना। यदि एक दल का कार्यकर्ता दूसरे दल के कार्यकर्ता द्वारा भेजे गए जलपान को सम्मानपूर्वक स्वीकार करता है, तो इसमें कोई राजनीतिक समझौता आवश्यक नहीं है। यह सामान्य मानवीय व्यवहार भी हो सकता है और सामाजिक सद्भाव का सकारात्मक संकेत भी।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद संवाद बनाए रखने में भी निहित है। विरोधी विचारों वाले लोग जब एक-दूसरे के प्रति शिष्टाचार निभाते हैं, तो समाज में यह संदेश जाता है कि विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय गरिमा सबके लिए समान है।
पीलीभीत का यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि राजनीति में प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए, पर समाज में वैमनस्य नहीं; विचारों में मतभेद होने चाहिए, पर व्यवहार में मर्यादा बनी रहनी चाहिए।
आखिरकार, लोकतंत्र में मत अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मन में सम्मान की जगह हमेशा रहनी चाहिए। जलपान की एक छोटी-सी पहल भी यही संदेश दे सकती है—राजनीति अपनी जगह है, भारतीय संस्कृति और आपसी सद्भाव अपनी जगह।
#Pilibhit #पीलीभीत #MLCचुनाव #भारतीयसंस्कृति #राजनीति_अपनी_जगह #संस्कृति_अपनी_जगह #राजनीतिक_सद्भाव #आपसी_सम्मान #सामाजिक_सद्भाव #लोकतंत्र #राजनीतिक_शिष्टाचार #भाईचारा #वसुधैव_कुटुम्बकम् #अतिथि_देवो_भव #भोजन_का_सम्मान #डॉ_आस्था_अग्रवाल #BJP #भारतीय_परंपरा #सकारात्मक_राजनीति #PilibhitDarpan
Source
