बरेली। विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन बरेली मंडल की सियासत में बारूद बिछ चुका है। पिछले विधानसभा चुनाव में बदायूं-बरेली में जड़ें जमाने और फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने वाली सपा अब पूरे रुहेलखंड में बिसात बिछाने में जुट गई है। भाजपा में उपेक्षित पड़े नेताओं और हाशिये पर आए पुराने समाजवादियों को जोड़कर सपा ने सियासी चक्रव्यूह की रचना शुरू कर दी है।

यूं तो बदायूं सपा का पुराना गढ़ रहा है, लेकिन मोदी-योगी युग शुरू होते ही भाजपा यहां हावी हो गई थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने बदायूं की तीन और बरेली की दो सीटों पर कब्जा कर दोबारा ताल ठोंकी थी। फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में बदायूं और आंवला जैसी सीटों पर मिली बढ़त ने सपाइयों में जोश भरा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मंडल में गैर-यादव ओबीसी, खासकर शाक्य और कश्यप बिरादरी को जोड़कर पार्टी अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को जमीन पर उतारने में जुटी है।
कुशाग्र का जाना मजबूरी, बरसों से सपा-भाजपा को नहीं मिला तीसरा चेहरा
सपा ने बदायूं की बिसौली सुरक्षित सीट के पूर्व विधायक कुशाग्र सागर को साथ लिया है। कुशाग्र दुष्कर्म के चर्चित मामले में सजा काट रहे पूर्व विधायक योगेंद्र सागर के पुत्र हैं। पिछले चुनाव में उन्हें बेहद कम अंतर से सपा के आशुतोष मौर्य से हार मिली थी। इस बार आशुतोष भाजपाई हो गए हैं। 25 साल से आशुतोष व कुशाग्र के परिवार ही सपा-भाजपा या बसपा की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। पहले सुरक्षित सीट बिल्सी होने पर आशुतोष के पिता भोलाशंकर मौर्य वहां से लगातार विधायक बने और मंत्री भी रहे। फिर योगेंद्र सागर वहां से विधायक बने। अब बिसौली सीट सुरक्षित होने पर आशुतोष व कुशाग्र यहां क्रमवार जीतते रहे हैं। आशुतोष के भाजपा में जाने के बाद कुशाग्र के पास सपा में जाने का ही विकल्प था। अब दोनों ही नेता बदली हुई पार्टियों से आमने-सामने चुनाव लड़ सकते हैं।
सपाई ही थे सिनोद, नहीं मिला टिकट तो एमएलसी चुनाव में दिया गच्चा
सिनोद शाक्य दातागंज से लगातार दो बार विधायक रह चुके हैं। पिछले चुनाव में भी वह सपा में ही थे, लेकिन कैप्टन अर्जुन के मुकाबले टिकट नहीं पा सके। सपा ने उन्हें एमएलसी चुनाव में प्रत्याशी बनाया। राजनीतिक हालात भांपकर सिनोद ने एमएलसी चुनाव में भाजपा प्रत्याशी बागीश पाठक के मुकाबले अपना नामांकन ऐन मौके पर वापस ले लिया। इससे बागीश निर्विरोध चुनाव जीत गए। अब सपा में उनके मुकाबले कैप्टन अर्जुन, पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप व पूर्व विधायक प्रेमपाल सिंह यादव के बेटे जैसे कई नेताओं के नाम आते हैं। एक को टिकट मिलने पर बगावत की गुंजाइश भी बरकरार है। सपा ने बदायूं के ही नेता केसी शाक्य को साथ लिया है।
धर्मेंद्र पहले ही कर चुके किनारा
आंवला से भाजपा के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप पहले ही भाजपा छोड़ चुके हैं। उनके निर्वाचन क्षेत्र में बदायूं की दो सीटें दातागंज व शेखूपुर आती हैं। वह भी भाजपा में असंतोष झेल रहे थे। सपा की ओर रुख करके उन्होंने अति-पिछड़े तबके, खासकर कश्यप और मल्लाह बिरादरी में सियासी असंतोष को भुनाने की कोशिश है। ऐसे ही शाहजहांपुर से प्रदीप पांडेय, तिलहर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख सौरभ सिंह गांधी और बसपा के रामाकांत गौतम की आमद से सपा यह संदेश देना चाहती है कि उसका गठबंधन सिर्फ पारंपरिक जातियों तक सीमित नहीं है। पीलीभीत में पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू को जोड़कर सपा ने परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश की है।
पिछड़ों की गोलबंदी में भाजपा भी पीछे नहीं
सपा की इस घेराबंदी के बीच भाजपा भी मंडल के कुर्मी और लोध मतदाताओं को एकजुट रखने के लिए बड़ा सियासी दांव चल चुकी है। पार्टी ने झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह को राज्यसभा भेजकर यह संदेश दिया है कि अपने मजबूत आधार को वह किसी भी कीमत पर खिसकने नहीं देगी।
चुनावी बारिश में उफनते हैं पोखर और तालाब : लोधी
भाजपा ब्रज प्रांत के अध्यक्ष पूरनलाल लोधी से नेताओं के सपा छोड़ने के सवाल पर कहा कि चुनावी बारिश का वक्त है। तालाब व पोखर उफन जाते हैं, लेकिन समुद्र पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भाजपा के संपर्क में भी दूसरे दलों के कई नेता हैं, लेकिन वक्त आने पर पत्ते खोले जाएंगे। ये बदलाव सामान्य प्रक्रिया है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।





